चोट खा दर्द कब तक छुपाएँ,
आजकल गर्म हैं अब हवाएँ।
लोग पूछे बता क्या हुआ है,
हाल बोलों किसे हम बताएँ।
दोस्ती पर भरोसा कहाँ अब,
हाल बेहाल हरदम रुलाएँ।
जिंदगी दरबदर हो तड़पती,
जख्म देती यहाँ पर जफाएँ।
लोग तिरछी नजर झांकते हैं,
आह भरतीं यहाँ पर वफाएँ।
मर्ज हद से बढ़ा जा रहा है,
आग उगलें यहाँ पर दुआएँ।
खेल कब तक चलेगा बता’अनि’,
अब बहुत हो गया दिल जलाएँ।
– अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
