बहुत है – ज्योत्सना जोशी

बेशक तुझसे दूर होने का मलाल बहुत है,

जाने क्यों ठहरी निगाहों में हलचल बहुत है।

 

घटने-बढ़ने की बात कमज़र्फ किया करते हैं,

अहसासात में उफान का समंदर बहुत है।

 

खुशबू ख्वाहिश खुलूश खामोशियों में है,

दुआओं में असर जुस्तजू में चुभन बहुत है।

 

शिगाफ सी रह गई पिछली किसी बात की,

मुद्दतों की मुलाकात हिज़्र की तड़पन बहुत है।

 

मैं बहुत दूर आ पहुंची हूं इन राहों में कहीं,

लौट जाने की हर आहट में सिहरन बहुत है।

 

हर शख्स  जमाने में अपना नहीं होता है

दिखावे की मुस्कराहट से नफ़रत बहुत है।

 

शब भर जला दींया रूह के अलाव तपन का,

बेख्याल आंखों को नींद से अनबन बहुत है।

– ज्योत्सना जोशी , देहरादून, उत्तराखंड

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *