बहरारे वाली दुर्गे मां – अनिल भारद्वाज

 

बहरारे वाली दुर्गे मां शिला से बाहर आ मेरी मां।

दर्शन देने को मेरी मां शिला से बाहर आ मेरी मां।

 

नौ रूपों में से माता इक तो दिखा दे,

अंखियों में अपनी प्यारी सूरत बसा दे।

जीभर के देखूं  मेरी मां शिला से बाहर आ मेरी मां।

 

भवनों में आती मैया खुशबू तुम्हारी,

हवनों में बन जाती आकृति तुम्हारी,

चरणों को छू लूं मेरी मां शिला से बाहर आ मेरी मां।

 

अपने आंचल में मैया मुझको छुपा ले,

अपनी गोदी में मैया मुझको बिठा ले।

सिर पर तू हाध रखने मां शिला से बाहर आ मेरी मां।

 

दुर्गे कहूं मां तुझको या मैया काली,

ऊंचे पहाड़ों की तू रहने वाली,

मेरे भी घर में रहने मां शिला से बाहर आ मेरी मां।

 

अब तो प्रकट होने मां शिला से बाहर आ मेरी मां।

बहरारे वाली दुर्गे मां शिला से बाहर आ मेरी मां।

– अनिल भारद्वाज एडवोकेट,

उच्च न्यायालय ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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