फिर वही खाली हाथ – गुरुदीन वर्मा

 

फिर वही खाली हाथ,

हमेशा दिखाई दिया मुझको,

कमी कहाँ थी उस घने वट में,

इतनी शाखायें, इतने पर्ण,

वजनी इतने फल और,

इतनी छाया का प्रभुत्व,

लेकिन फिर वही खाली हाथ।

 

उत्पन्न किये थे जो उसने,

नये अंश एक बाग लगाने के लिए,

अलग हो चुके थे उनमें से कई अंश,

आधुनिकता की आंधी और प्रतिस्पर्धा में,

विकसित हो चुके थे वो दूर उस वट से,

अपनी नई पहचान और नये नाम से,

और नजर आया मुझको वह,

फिर से एक खाली हाथ ही।

 

तलाश रहा है वह अब,

शान्ति किसी के पास जाकर,

अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में,

लेकिन टूट नहीं रहा है,

उसका आकर्षण चुम्बक की तरहां,

अपने उन अंशों से जिनसे वो हैं

फिर वही खाली हाथ।

– गुरुदीन वर्मा उर्फ़ जी.आज़ाद

तहसील एवं जिला- बारां (राजस्थान)

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