फागुन के रंग – सविता  सिंह

कितनी बीती पूस की रातें,

कितने स्वप्न बसंत के,

याद दिलाती हर फागुन वो,

अंतरमुखी प्रिय उस कंत के।

पीली सरसों, पीत अमलतास,

बिखरे धरा पर रक्तिम पलाश,

हर रंगोत्सव पर वो इंतज़ार,

रंग देता काश! यह एहसास।

दूर नेपथ्य से आते थे गीत,

तन-मन कर देते थे पुलकित,

लगता उस राग की नायिका मैं,

सोच-सोच हो उठती सस्मित।

कैसे कह दूँ  तुझको साजन,

पर तुमने रंग डाला तन-मन,

देख गुलाल यूँ फेंकना हवा में,

बिन छुए ही बढ़ती धड़कन।

भीगे आँगन, सूनी पायल,

चुपके रो लेती थी काजल,

भीड़ भरे उस रंग-महोत्सव में

मन रहता था फिर भी बेकल ।

कितने गुज़रे फागुन रंगों के,

कितने सावन बिन तेरे झरे ,

रंग तो हर बरस आए लेकिन

मन के कोरे पृष्ठ न भरे।

अब भी जब अमलतास दहकता,

सरसों पीली चूनर ओढ़े,

लगता तुम फिर आओगे शायद,

रंग लिए हथेली मोड़े।

-सविता  सिंह मीरा, जमशेदपुर

 

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