फागुन आयो रे, रंगों का संदेशा लाया,
सूखी डालियों पर भी उसने गीत सजाया।
पीली-पीली सरसों हँसकर खेतों में बोली,
धरती ने ओढ़ी चूनर, मन ने बाँची होली।
बयार संग आई है मादक सी अंगड़ाई,
कोयल ने कुहुक-कुहुक कर तान छेड़ी भाई।
टेसू के फूलों में लाली की है बरसात,
हर पत्ती में धड़कन, हर पल में सौगात।
ढोलक की थापों पर गाँव थिरकने लगा,
बचपन फिर से आँगन में आकर बसने लगा।
माथे पर अबीर सजा, हाथों में रंग,
रूठे हुए सपनों से भी टूटे सारे भंग।
फागुन की हवाएं मन बहकाये प्रेम ऋतु-गान,
बैर-विद्वेष गल जाए, मिटे मन का अभिमान।
साजन-साजन पुकारे अलसाई सी रात,
पायल बोले छन-छन, लाज करे बरसात।
अबकी फागुन में सीख मिले जीवन का सार,
रंग बाँटने से ही मिट जाते सब द्वेश ।
जो रूखा था, वह भी रस में भीग जाए,
फागुन आयो रे,हर दिलख़ुशियाँ मनाये ।
– वैशाली रस्तोगी, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
