लौट आना स्वीकार्य भी है
और अनिवार्य भी
लौट आना हमेशा निर्बल या
निरीह नहीं होता,
लौट आना उन रिक्त जगहों
पर रंगों के कुछ छींटों को
उड़ेलना जैसा है
जो पूर्ण भले ही ना हो
लेकिन अपूर्ण भी नहीं है,
लौट आना विरक्ति नहीं है
लौट आना भी प्रेम ही है।
– ज्योत्सना जोशी, देहरादून
