प्रेम का गुलदस्ता – सामाजिक चिंतन का पुलिंदा – डॉ अमित कुमार बिजनौरी

vivratidarpan.com – प्रेम पथिक एक ऐसा साझा गीत संग्रह है जिसके मुख्य संपादक डॉ. नरेश सागर हैं। इसमें 31 कवि और कवियित्रियों के गीतों को संक्षिप्त जीवन-परिचय के साथ सम्मिलित किया गया है। इस पुस्तक में एक से बढ़कर एक गीत ही नहीं, प्रिय पाठकों के लिए कुछ नया सीखने को भी बहुत कुछ है।
यदि हम पुस्तक की साहित्यिक यात्रा की ओर चलें तो इसका मुखपृष्ठ देखते ही बनता है, जो पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
पृष्ठ संख्या 03 पर सह-संपादक का चित्र मनमोहक प्रतीत होता है।
पृष्ठ 04 से 06 तक मुख्य संपादक महोदय का बहुत ही सुंदर आलेख दिया गया है।
पृष्ठ 07 से 08 तक कवियित्री रचना वानिया जी द्वारा लिखी गई पुस्तक की भूमिका काबिले-तारीफ़ है।
पृष्ठ 09 से 11 तक समर्पण में डॉ. नरेश सागर जी ने
“कब आएगा बोल कबीरा, बहुत बढ़ रहा झोल कबीरा”
के माध्यम से बहुत सुव्यवस्थित ढंग से अपनी बात को कलमबद्ध किया है।
पृष्ठ 12 पर कवि अरुण नामदेव जी का शुभकामना संदेश अंकित है।
पृष्ठ 14 पर कवियित्री रामकुमारी “शगुन” जी द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना ने पुस्तक में चार-चाँद लगा दिए हैं।
पृष्ठ 15, 17 और 18 को “अधरों की मुस्कान”, “मत भूल रे बन्दे” और “गाँव की पगडंडी” जैसी रचनाओं से सुसज्जित किया गया है, जिनमें प्रेम को जीवन में अपनाने पर विशेष ज़ोर दिया गया है।
पृष्ठ 19 से 22 तक डॉ. रामगोपाल भारतीय जी का जीवन-परिचय तथा तीन रचनाएँ—
“लोग अब डरने लगे हैं प्यार से”, “हाँ, मैं मन के गीत लिखूँगा”, “आ भी जाओ आ भी जाओ”
बहुत ही सहज, सरल और खूबसूरत शैली में प्रस्तुत की गई हैं।
पृष्ठ 23 से 26 तक कवि श्याम बिहारी जी ने अपने गीत
“प्यार हुआ तब कविता से”, “वरना हम करते नहीं”, “हमको बहुत प्यार है”
से जनमानस के दिल को छू लेने का प्रयास किया है।
पृष्ठ 27 से 29 तक महाकवि डोरीलाल भास्कर जी की जीवनी और उनकी रचनाएँ—
“धम्म दिवस 14 अक्टूबर 1956” और “गुमनाम कवि”
इंसान को इंसान से प्रेम करने की वकालत बड़े मार्मिक ढंग से करती हैं।
कवयित्री कल्पना मौर्य जी (पृष्ठ 30) ने अपनी रचनाओं—
“विरह वेदना”, “कली एक कुम्हलाई है”
में शब्दों को बड़ी चतुराई से गूँथा है।
कवि रामआसरे गोयल जी (पृष्ठ 33–36) की रचनाएँ—
“प्रिय ने मुझको”, “बहारें आई जीवन में”, “ये मिलन सखे”
पाठकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।
कवि रामानंद सागर जी (पृष्ठ 38–40) की रचनाएँ—
“मन की अंगड़ाई में”, “प्रेम जगत का सार”, “बाँधे बनिया बाज़ार”
हर दिल को छूने में सक्षम हैं।
कवि राजबहादुर यादव जी (पृष्ठ 41–44) की रचनाएँ—
“देश प्रेम”, “प्यार के घूँट”, “करूँ प्यार कैसे”
भावनाओं की गहराई से ओतप्रोत हैं।
कवियित्री सरिता शर्मा जी (पृष्ठ 46–48) की रचनाएँ—
“अनकहा”, “मेरी कलम”, “कहाँ हो प्रभु”
दिल को छूने वाली अनूठी रचनाएँ हैं।
कवि पंकज कुमार शर्मा जी (पृष्ठ 49–52) ने
“कैसे रोका होगा”, “प्रीत की माला”, “अधूरे जीवन”
जैसी रचनाओं में भावों को सहजतापूर्वक उकेरा है।
कवि दिनेश आनंद जी (पृष्ठ 54–56) की रचनाएँ—
“प्रेम पथ”, “मान भी होता नहीं”, “विरह प्रेम गीत”
अत्यंत प्रभावी हैं।
कवि दिलीप तम्बोली जी (पृष्ठ 58–60) की रचनाएँ—
“ये दुआ है मेरी”, “तन्हाई”, “और कई रात”
उत्कृष्ट प्रस्तुति हैं।
कवयित्री राजकुमारी “शगुन” जी (पृष्ठ 62–64) की रचनाएँ—
“मेरे प्रीतम”, “नव दुल्हन”, “राखी का त्यौहार”
सहज और सरस हैं।
कवि कपूराराम मेघसेतु जी (पृष्ठ 66–68) की रचनाएँ—
“इन मन मोहे प्रेम धुन”, “उठी यूँ सागर की हिलोरें”, “ढाई अक्षर प्रेम का”
बहुत उत्कृष्ट हैं।
कवि देवेंद्र “देव” जी (पृष्ठ 70–72) की रचनाएँ—
“नीलकंठ”, “अधूरी ख्वाहिश”, “सिरहाना”
मन को छू जाती हैं।
कवियित्री रचना वानिया जी (पृष्ठ 74–76) की रचनाएँ—
“मेरा साथ”, “प्रेम की बात”, “कण-कण में संगीत समाया”
बहुत उत्कृष्ट गीत हैं।
कवि वीरेंद्र मेहता जी (पृष्ठ 78–80) की रचनाएँ—
“बुढ़ापे की दस्तक”, “जब अपने ही पराए हो जाते हैं”, “टूटते रिश्तों का दर्द”
उम्दा सृजन हैं।
डॉ. अमित कुमार बिजनौरी जी (पृष्ठ 82–84) की रचनाएँ—
“जीवन बीते प्यार में”, “चहुँ ओर फैले गिद्ध”, “आधुनिक नारी”
बेहद प्रभावशाली हैं।
कवयित्री सपना श्रुति जी (पृष्ठ 86–88) की रचनाएँ—
“पिता का विश्वास”, “मैं अपनी कहानी खुद हूँ”, “आत्मा का संवाद”
अत्यंत उम्दा हैं।
कवि सुरेंद्र “झनूण” जी (पृष्ठ 90–92) की रचनाएँ—
“गाँव प्रेम”, “विरह वेदना”, “दिल मेरा रोने लगा”
शब्दों की शानदार जादूगरी हैं।
कवि कुलदीप कर्दम जी (पृष्ठ 94–96) ने
“उनकी नज़र”, “पैमाना”, “तेरे-मेरे सपने”
जैसी ग़ज़ब की रचनाएँ दी हैं।
कवियित्री रवि रश्मि “अनुभूति” जी (पृष्ठ 98–100) की रचनाएँ—
“प्रेम”, “अप्सरा”, “करना सच्चा प्यार”
पाठकों को सोचने पर विवश करती हैं।
कवि चंद्रशेखर मयूर जी (पृष्ठ 101–104) की रचनाएँ—
“सजा लीजिए”, “गाँव हमारा न्यारा है”, “गौरी तेरे प्यार में”
मन को सीधा स्पर्श करती हैं।
कवि सुरेंद्र राही जी (पृष्ठ 105–108) की रचनाएँ—
“बेवफ़ा हुई तुम”, “किस ओर जा रहा”, “चले अब गाँव की राह”
बहुत मधुर और सुसज्जित हैं।
पृष्ठ 109 से 112 तक तीन उत्कृष्ट रचनाएँ—
“पहले हिंदुस्तान है”, “नयनों से हो गई सगाई”, “माँ की चिट्ठी आई”
अत्यंत सराहनीय हैं।
कवि नगेंद्र प्रताप जी (पृष्ठ 113–116) ने
“माता-पिता से ज़्यादा”, “अपने मन से”, “वर्षा का भी तुम कारण”
जैसी लाजवाब रचनाएँ दी हैं।
युवा कवि भुवनेश कुमार (पृष्ठ 117–120) ने
“मुझे देखती रही वो”, “मैं देख न सका था”, “कभी याद करना”
में भावों को बहुत सुंदरता से व्यक्त किया है।
कवि संजय कुमार जी (पृष्ठ 121–123) की रचनाएँ—
“क्या लिखूँ कविता माँ”, “माँ जब तू बुलाती है”
बड़ी मार्मिक हैं।
कवयित्री डॉ. स्वदेश मल्होत्रा “रश्मि” जी (पृष्ठ 124–127) की रचनाएँ—
“उम्मीदों के भगोने में”, “नारी हूँ मैं दिखला दूँगी”, “मार्मिक दोहे”
अत्यंत सुंदर हैं।
कवि सचिन निगम जी (पृष्ठ 128–131) की रचनाएँ—
“खुशी के नग्मे गाता है”, “खाली पन्नों पर”, “धीरे से मुस्करा”
बहुत सुंदर हैं।
अंत में मुख्य संपादक डॉ. नरेश सागर जी की लाजवाब रचनाएँ पुस्तक को विशेष ऊँचाई प्रदान करती हैं।
पृष्ठ 134 का अंश—
“प्रेम पथिक के प्रेम दीवाने, हुए एक जो थे अनजाने…”
मन को स्पंदित कर देता है।
प्रिय पाठकों से कहना चाहूँगा कि यह पुस्तक अत्यंत सुंदर और लाजवाब है। नए नवांकुरों को इसे अवश्य खरीदकर पढ़ना चाहिए। इसमें बहुत कुछ नया और सीखने योग्य है।
अंत में सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ तथा मुख्य संपादक को आकाश भर दुआएँ।
पुस्तक का नाम :- प्रेम पथिक साझा गीत संग्रह
प्रकाशन :- लायन्स प्रकाशन, ग्वालियर (म.प्र.)
मुख्य संपादक :- जनकवि, बेखौफ शायर डॉ. नरेश सागर
पुस्तक समीक्षक :- डॉ अमित कुमार बिजनौरी
पुस्तक मूल्य :-345/-
— डॉ. अमित कुमार बिजनौरी
नव साहित्य परिवार भारत
तथा नव साहित्य मासिक ई-पत्रिका संस्थापक/संपादक
कदराबाद खुर्द, स्योहारा जिला बिजनौर, उत्तर प्रदेश

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *