प्रसन्न रहें
औरों में मत फंसें,
स्वयं में रहें !!1!!
जीवन हो कैसा
जब जहाँ जैसे हो,
मस्ती में जीएं !!2!!
सीखें अपनी
अनुभूति से हम,
स्वयं में रमें !!3!!
प्रभु बसते
हमारे अंतस ही,
चलें खोजते !!4!!
प्रकट होते
प्रभु हृदय में ही,
जहाँ प्रेम है !!5!!
आनंद बांटें
क्योंकि पूर्ण है हम,
अंश प्रभु के !!6!!
प्रसन्नता को
औरों में लीन करें,
वही प्रेम है !!7!!
– सुनील गुप्ता
जयपुर, राजस्थान |
