पूर्णिका (समय और मौका) – श्याम कुंवर भारती

 

आज रोपा बीज कल निकले अंकुर और फलने फूलने लगे।

ऐसा होता नहीं आज हुआ पैदा और कल चलने फिरने लगे।

 

समय पर होता हर काम ज्यादा डालो पानी पौधा सुख जाता।

कली जो निकली ही नहीं और चाहो वो चहकने महकने लगे।

 

कर्म कोई बेकार नहीं जाता प्रतिफल लौटकर आता है जरूर ।

समय सरंक्षण संयम अगर हो तो परिणाम मिलने जुलने लगे।

 

पक्का बनने से पहले कच्चे घड़े को तपना पकना पड़ता है।

तपने व पकने में धैर्य साहस न रहे तो वजूद टूटने फूटने लगे।

 

समय का मूल्य अनमोल बीत गया  कभी लौटकर आता नहीं।

समय व मौका मिले ना दुबारा चुका भारती सिर पीटने कुटने लगे।

– श्याम कुंवर भारती, बोकारो, झारखंड

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