पूर्णिका – श्याम कुंवर भारती

 

चल रहे है कटार बड़े दिल पर मेरे तेरी बेवफ़ाई है।

तू मिला नहीं मुझे मगर दुनिया में मेरी रुसवाई है।

 

इश्क मुश्क और खांसी छिपते नहीं कभी भी कही ।

छुपाना चाहा मगर चर्चा तेरी बड़ी दूर तलक आई है।

 

घटा तेरी जुल्फे आंखे  बिजलियां दिल जलाती हैं।

तूने जुल्फे बिखराई फ़िजाँ देखो काली घटा छाई है।

 

कहूं किससे बात दिल की इक तेरे सिवा बोलो तुम।

इठला रहे झोंके हवाओ कही आंचल तूने लहराई है।

 

सिसक रहा है दिल बगैर तेरे जाऊं तो कहा जाऊं मैं।

सांस सीने में अटकी है मेरी जान पर अब बन आई है।

 

छलक रहा शैलाब आंखों में खातिर तेरे बहुत भारती।

मेरा होकर भी तू जैसे हो गई मेरे लिए अब पराई है।

–  श्याम कुंवर भारती, बोकारो, झारखण्ड

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