पूर्णिका (गर्मी में ठंड का एहसास) – श्याम कुंवर भारती

 

तुम अगर अपनी चुनर लहराओ ठंडी हवा का झोंका आ जाए।

अपनी रेशमी जुल्फे बिखराओ धूप में काली बदरी छा जाए।

 

तपती धूप गर्म हवाओं का झोंका तेरा धोखा तन मन जल रहा।

जरा मुस्कुरा बाहों समा जाओ गर्मी ठंड का एहसास आ जाए।

 

जल रही है धरती बरस रहा आग आसमान हम कहा जाए।

अपनी आंखों में काजल लगा आओ धूप में छांव आ जाए।

 

सुख रहा गुलशन भंवरें संग तितलियां प्यासे हैं दो बूंद के लिए।

थोड़ा खिलखिला जाओ झरने की कल कल का मजा आ जाए।

 

छाई बड़ी बेचैनी दिल भी मचल रहा है दिल न लगे तेरे बिन।

जरा महक जाओ बन खुशबू भारती सूखे फूलों रवानी आ जाए।

– श्याम कुंवर भारती , बोकारो, झारखंड

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *