आज बरसों बाद खोली संदूक
उसमें रखी थी कुछ किताबें
जो वह अपने साथ दहेज में लाई थी
उनको खोलने और पढ़ने का
वक्त ही न मिला
पीले पड़ गए थे वर्के सारे
कह रहे दास्तां उसके बिखरे जीवन की
सुना रहे कुछ अनकही कहानियां
उसके प्रेम और अल्हड़पन की
उसकी प्रतिभा को नापा गया
चकले पर गोल रोटी से
या गृहस्थी के उलझे धागों को
सुलझाने में
उसकी सहमति भी न ली गई
घर के महत्वपूर्ण फैसलों में
पर उसका घर में होना जरूरी बहुत था
याद नहीं उसे कितने सावन
अकेले बैठ गुजारे हैं
कितनी सर्द रातें जाग के बिताई हैं
कभी यह पुस्तकें हमराज हुआ करती थी
आज जब कोई नहीं हैं साथ उसके
फिर भी यही साथ निभाने को तैयार है
उसके अकेलेपन को फिर से
बांटा इस कागज़ और कलम ने
एहसासों को पिरोकर लफ्जों में
कागज़ को रक्तिम किया हैं लहू से
कौन जाने पीड़ा इसके मन की
उसने तो पीड़ा को हो जिया हैं
चंद कागज़ के टुकड़ों को देख
उसने फिर से जी लिया जीवन
ओढ़ ली वह जवानी की अल्हड़ मस्ती
कुछ अधूरे ख्वाब, कुछ उनींदी बातें
जो बरसों पहले दफ़न हो गई थी इनमें
संचित बुकमार्क मुस्करा रहे हैं
खुले मन से कर रहे स्वागत
तैयार है संजोने उसकी पीड़ा को
अपने आंचल में ,फिर से एक बार
दिखा रही प्रकाश,कर रही उत्साहित
जीवन के सावन में भीगने को
उन ख्वाबों को साकार करने
जो कहीं इन पुस्तकों में बंद हो गए
– रेखा मित्तल, चंडीगढ़
