पुरानी किताब – रुचि मित्तल

शायद किसी पुरानी किताब के बीच

दबा हुआ वो सुर्ख गुलाब है

जिसकी पंखुड़ियाँ तो सूख गई हैं

पर खुशबू अब भी पन्नों में सांस लेती है।

​ये वो बेनाम सी दस्तक है

जो खाली मकान के बंद दरवाज़े पर

अक्सर आधी रात को सुनाई देती है

पर खोलो… तो बस धूल उड़ती है

और यादों का एक साया सा गुज़र जाता है।

​प्यार क्या है?

किसी की आवाज़ को ओढ़कर सो जाना

या किसी के ज़िक्र भर से

भीतर कहीं कुछ चटकने की आवाज़ सुनना।

ये उस ठहरे हुए पानी की तरह है

जिसमें कंकड़ मारो तो लहरें नहीं बनतीं

बस गहराइयाँ और गहरी हो जाती हैं।

​जैसे सर्दी की धूप में

छत पर बैठ कर हाथ सेंकना,

और अचानक बादलों के आते ही

एक अजीब सी ठिठुरन का रूह तक उतर जाना।

​हाँ… प्यार बस इतना ही है

एक मुकम्मल सी बेचैनी

जो जीने का बहाना भी है

और मरने की फुसफुसाहट भी।

©रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा

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