पिता हमेशा तप करता है,
कड़ी धूप में काम वो करता,
राह कंटीली वो चलता है,
श्रम की भट्टी में वह जलता,
बच्चे को दे शीतल छाया,
कर्म मार्ग पर चलते चलते,
नहीं कभी वह तो रुकता है,,
पिता हमेशा तप करता है।
बच्चों में जां उसकी बसती,
फूलों सा उनको रखता है,
खुद भूखा प्यासा रह जाए,
बच्चों को सब कुछ देता है,
उसके सपने पूरे करने,,
अंगारों पर वो चलता है,,
बना संतुलन दोनों में वह,
कांधे पर वो जग धरता है,
पिता हमेशा तप करता है।
– श्रीमती निहारिका झा, खैरागढ़ राज, छत्तीसगढ़
