आज चर्चा हो रही है, हर गली हर गाँव में।
क्यों पलायन हो रहा है, आज अपने ठाँव में।।
क्या महज धन की ललक में, छोड़ दी अपनी धरा।
या शहर की चाँदनी ने, लोभ मन में है भरा।।
खेत और खलिहान अपने, बेच कर सब क्यों चले।
और ममता का पसेरा, तुम पले जिसके तले।
ढूँढने खुशियाँ चले हो, अजनबी से शहर में।
छोड़ पावन सरित अपनी, बह चले किस लहर में।।
नौकरी तुमको है भायी, बादशाहत छोड़ कर।
जी हुजूरी में लगे क्यों, काम अपना छोड कर।।
अन्न के दाता तुम्हीं हो, पालते हो लोक को।
बाँटते खुशियाँ घरों में, दूर करते शोक को।।
पेट भरने तू चला है, शहर में अचरज बड़ा।
छोड़ अपने गाँव को, मूरख कहाँ तू है खड़ा।।।
है तेरी मिट्टी में सोना, सत्य यह तू जान ले।
हाथ में तेरे कलम है, भाग्य की तू मान ले।।
हो रही पगडंडियाँ सूनी कहो किस डाह में।
क्या समझता फूल ही होंगे तुम्हारी राह में।।
है अभी अनभिज्ञ प्यारे, तू शहर की दाह से।
है समय अब भी संभल जा, तू व्यर्थ की चाह से।।
ये खुला आँगन ये ठंडी, छाँव तू न पायेगा।
कंक्रीटों का शहर कब रास तुझको आयेगा।।
अपनी करनी पर मनुज तू एक दिन पछतायेगा
देख लेना लौट कर फिर तू गाँव अपने आयेगा।।
– डॉ क्षमा कौशिक, देहरादून
