नेताजी – रुचि मित्तल

वो तस्वीर नहीं थे

जो दीवार पर टाँग दी जाए

वो सवाल थे

जो हर गुलामी से

सीधा टकराता है।

जब बोलना सुरक्षित था,

तब उन्होंने

लड़ना चुना।

जब भीख माँगना आसान था

तब उन्होंने

हक़ छीनना सिखाया।

उनकी आवाज़

माइक की मोहताज नहीं थी

वो सीधे

रगों में उतरती थी

और खून को

चलना याद दिलाती थी।

“#तुम_मुझे_खून_दो”

कोई नारा नहीं था

वो एक सौदा था

आज़ादी के बदले

सब कुछ लुटाने का।

नेताजी

ड़र से नहीं लड़े

उन्होंने

डर को

पीछे हटना सिखाया।

आज भी

अगर सीना भारी नहीं होता

उनका नाम सुनकर

तो समझ लो

हम ज़िंदा तो हैं,

पर जागे नहीं।

©रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा

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