नासमझ सी मैँ
पता नहीं
सुधर रही हूँ या
बिखर रही हूँ
थक गई हूँ
समझाते-समझाते
नहीं दिखा सकती
अपने मन की बेचैनियाँ
अधकचरे ख्वाबों की दास्ताँ
जीवन के इस पड़ाव पर
खुद को खोजना चाहती है
नासमझ सी हो गई हूँ
या समझना ही नहीं चाहती
सांस लेना चाहती हूँ
खुले आसमान में
अपने ही नियमों के साथ
जीना सीख रही हूँ
नहीं बँधना चाहती
ऐसे बंधनों में
जिनसे मुक्त होना मुश्किल हो
अब अकेले ही, खुद के साथ
समय बिताना चाहती हूँ
अपनी गलतियों को
मैं भी दोहराना चाहती हूँ
नासमझ सी हो गई हूँ
या समझना ही नहीं चाहती
-रेखा मित्तल, चण्डीगढ़
