शीत सरकते माह में..
करने दिल्ली के सैर चले..
टोंट बँधी बर्फीली हवा से..
करके हिम्मत, खैर चले..
गधे के सर से सींग सरीखा.
आसमान बिन सूरज के..
हालांकि इस वक्त घडी में..
बीस मिनट थे दो बज के..
धुन्ध और कोहरे की चादर..
हाथ को हाथ न दिखता था..
दो पेडों का झुंड दूर से..
इंडिया गेट सा लगता था..
तभी अचानक नजर पडी..
मानो दुर्वासा ऋषि आये..
पतली पतली निर्वस्त्र भुजा..
शंकर के अम्बर लटकाये..
ढकने के नाम पर बाजू पर..
बस टेटू लगे भुजंगो के..
घुटने से ऊपर तंग वस्त्र..
पायचे भिन्न-भिन्न रंगों के..
इक हाथ कमंडल पर्स लिये..
दूजे सिगरेट का दम भरती..
मस्तक पर भी बिंदी नागिन..
आई एकदम फूँ-फूँ करती..
बोली एक्सक्यूज मी मिस्टर
व्हेयर इज दिस नांगलोई..
गलती से मैं आ गयी यहाँ..
क्या होगी यहाँ से बस कोई..
मै बोला नागलोई में ही तो..
आप खडी हो मैडम जी..
मेरी बातों को सुन झटकी..
बोली एकदम.. नहीं समझी !
बोली इंडिया गेट है यह तो..
राष्ट्रपति का भवन यहाँ..
हाईकोर्ट दिख रहा पास में..
नांगलोई यहाँ आई कहाँ..
मैं बोला मैडम जी देखो..
झूठ बात मैं नही करता..
#नाग लपेटे तुम फिरती..
और #लोई लपेटे मैं फिरता..
– भूपेन्द्र राघव, खुर्जा, उत्तर प्रदेश
