नव वर्ष : आत्ममंथन से नवसृजन तक

vivratidarpan.com – अंग्रेज़ी नव वर्ष हो या भारतीय नव वर्ष यह केवल कैलेंडर की तारीख़ बदलने का नाम है। यह आत्मा के द्वार पर दस्तक देता हुआ एक नया अवसर है। यह वह क्षण है जहाँ हम ठहरकर स्वयं से संवाद करते हैं। बीते वर्ष की स्मृतियों में सुख भी है और पीड़ा भी, परंतु जीवन का सौंदर्य इसी संतुलन में निहित है। जो खोया, उसने हमें समझ दी; जो पाया, उसने हमें संभाला और आगे बढ़ने का साहस दिया।
अब समय है गिले-शिकवों की गठरी उतार देने का, क्योंकि बोझ लेकर कोई भी यात्रा मंगलमय नहीं होती। जीवन का मूल सिद्धांत है जो बीत गया उसे बोध बनाओ जो आने वाला है उसे संभावना। जब हम अतीत से सीख लेकर भविष्य की ओर देखते हैं, तभी वर्तमान सार्थक बनता है।
बैर, द्वेष और अहंकार छोड़कर जब हम सकारात्मक दृष्टि से संसार को देखते हैं तो वही संसार उत्सव में बदल जाता है। रिश्ते मुस्कुराने लगते हैं, मन हल्का हो जाता है और विचारों में उजास उतर आता है। नकारात्मकता का त्याग ही सच्ची उपलब्धि है, क्योंकि शांति बाहर नहीं स्वयं अंदर जन्म लेती है।
हमारे संस्कार-परंपरा हमें यही सिखाते हैं कि बड़ी बातों के अहंकार को त्याग कर, छोटे-छोटे सद्गुणों को अपनाया जाए। अच्छे मित्रों का स्वागत, संवाद की ऊष्मा, संवेदना का विस्तार यही जीवन का दर्पण है। कभी-कभी मौन भी सबसे सशक्त भाषा बन जाता है, जहाँ शब्द नहीं बल्कि स्पंदन और अनुभूति बोलते हैं।
नव वर्ष हमें नई चाहत देता है कुछ नया करने की, कुछ बेहतर बनने की और सबको एक सूत्र में बाँधने की। जीवन केवल स्वयं के लिए नहीं अपितु सह-अस्तित्व का उत्सव है। खुशी, उत्साह और उमंग तभी पूर्ण होते हैं जब हम उन्हें बाँटना जानते हैं। जब किसी और की मुस्कान हमारी उपलब्धि बन जाती है।

बीते कल के गिले-शिकवे दिल से हटाएँ हम।
नव आशा दीप हृदय-आँगन में जलाएँ हम।
पावन रिश्तों को प्रेमिल डोरी संग बाँधकर।
बैर त्यागकर प्रेम-संवेदना अपनाएँ हम।।????

— कविता बिष्ट ‘नेह’ अध्यक्ष जीवन्ती देवभूमि साहित्यिक एवं सामाजिक राष्ट्रीय पंजीकृत संस्था

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