नदी – निहारिका झा

आओ तुमको आज सुनाऊं

अपने उद्गम की मैं  कहानी

कोई नदी कहता मुझको

कोई  मुझे  कहता तटिनी

कहीं कहें सरिता, सलिला

बस प्रवाह है मेरा काम

ऊंचे पर्वत से मै निकली

सागर में मुझको मिलना

निर्झरणी धारा है मेरी

सतत प्रवाह मयी होती

कल कल धारा के द्वारा

नित संदेश यही देती

जीवन चलने का है नाम

नहीं है रुकना तेरा काम

मोक्षदायिनी पाप नाशिनी

कितने रखे हैं मेरे नाम।

जहां मिलेंगी धारा तीन

वहां त्रिवेणी मेरा नाम।

कोई कहे नदी…

– निहारिका झा, खैरागढ़, राज, छत्तीसगढ़

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