धन रोपनीया ये बालम – श्याम कुंवर भारती

 

हमसे ना होई धन रोपनिया ये बालम।

ननद मोर झलकावेली नथुनिया ये बालम।

 

खेतवा में सगरो लबालब पनिया भरल बा।

कादो माटी सनाइल गोड़वा ओढनिया सनल बा।

बरखा भिंजावे गोर मोर बदनिया ये बालम।

हमसे ना होई धन रोपनिया……….।

 

सासू हमके डांटे हरदम रहे ननद मोबाइलवा में बीजी।

लहुरा देवरवा गंउवा घूमे खेत जोतले के खीजी।

हथवा पिराला पिसे में चटनियां ये बालम।

हमसे ना होई धन रोपनिया……….।

 

गोदी के बलकवा रोवे कईसे बिया धान हम उखाड़ी।

ढोई कईसे बोझा धान चुए टप टप पानी ।

कइसे होई खेती असो बिगड़ल घरवा के चलनिया ये बालम।

हमसे ना होई धन रोपनिया…….।

 

गंउवा के सगरो खेत लहराए हरियर धान हो।

होई नाही रोपनी त बची कईसे लोगवा जान हो।

आवा पिया भारती आवा करे के जोतनिया ये बालम।

हमसे ना होई धन रोपनिया ये बालम।

– श्याम कुंवर भारती (राजभर), बोकारो,झारखंड

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