दो बिम्ब… माँ अँधेरे कोने में… – इंजी. अरुण कुमार जैन

 

आज मदर डे है..!

मना रहे हैं एक -एक, दो-दो बच्चे,

जिनकी माँ बड़े दुलार से, अपने बच्चों को पीजा, मैकरोनी या जमैटो का खाना खिलाती हैं,

छोड़ मोबाइल, टी. वी. के भरोसे बच्चों को,

किटी पार्टी या शॉपिंग में समय बिताती हैं.

रात्रि को ‘गुड नाईट डार्लिंग कहकर,बच्चों को ए. सी. में सुलाती हैं,

बच्चों ने माँ को अमेजान से गिफ्ट मंगाया है,

सुन्दर से पैकिंग में दे माँ को सरप्राइज दिलाया है.

बढ़े आयोजन, आउटिंग, मेकअप, फोटोग्राफी की बाहर आयी है.

घर-बाहर  है रौनक,

खुशियों की सरिता स्वयं आयी है.

 

2.जिन माताओं ने अपने पाँच से आठ बच्चों को स्वयं पाला,

सुबह चक्की से पीसा,

घर को झाड़ा, बुहारा,

दस जनों का खाना, गर्मी, सर्दी में चूल्हे पर खुद बरसों बनाया,

लकड़ी, कंड़ों के धुएँ से भर जाती थीं जिनकी आँखें,

फिर भी बड़े दुलार से पूरे परिवार को हर दिन खिलाया,

बर्तन, झाड़ू, पोंछा, कपड़ों की धुलाई हाथों से,

शायद उन मॉंओं को विश्राम का समय भी न मिल पाया.

वे माँ!!

आज अस्सी नब्बे वर्ष की होकर

चार-छह सन्तानों के होते हुये भी,

अशक्त देह लिए अकेली, आँखों में आँसू बहा रहीं हैं..

उनके बच्चे शेयर कर रहे,

माँ के साथ के पुराने फोटो,

माँ अँधेरे कोने में,

जीवन के आखिरी दिन,

वेदना में बिता रहीं हैं.?

 

– इंजी. अरुण कुमार जैन-विभूति फीचर्स)

 

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