दोहे – कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

 

देवतुल्य है हर पिता, वह जीवन का मूल।

वह पराग के तुल्य है, जिससे खिलते फूल।।1

 

संतति को देता सदा, गहन वृक्ष सम छाँव।

कष्ट न हो संतान को, खुद लग जाता दाँव।।2

 

पर्दे के पीछे करे, संतति के सब काम।

देकर उनको हर खुशी, वह करता विश्राम।।3

 

जीवन की हर जटिलता, करता रहता  दूर।

बिन पाले वह लालसा, दे ख़ुशियाँ भरपूर।।4

 

संकट यदि हो सामने, बन जाता दीवार।

दृढ़ता से वह हो खड़ा, सह लेता हर वार।।5

 

सही गलत में फर्क कर, दिखलाता वह राह।

बच्चे गलती मत करें, इतनी रखता चाह।6

 

ऊपर से वह शुष्क अरु, दिखता बहुत कठोर।

अंदर सागर नेह का, लेता सदा हिलोर।।7

 

प्रेम प्रदर्शन कर सके, पितु का नहीं स्वभाव।

आवश्यकता पूरी करे, खुद सह सर्व अभाव।।8

 

अनुशासन की नींव को, पिता करे मजबूत।

संयम से कैसे जियें, दे खुद नित्य सुबूत।।9

 

शुद्ध विचारों से सदा, जीवन बने पवित्र।

देकर दंड उलाहना, संयत करे चरित्र।।10

 

मातु पिता समतुल्य हैं, सच्ची है यह बात।

दोनो परम अमूल्य हैं, माता हो या तात।।11

 

जीवन के संग्राम में, पिता सदा है साथ।

हिम्मत देता है हमें, और पकड़ता हाथ।।12

 

माता संस्कारित करे, समझे अपना अंग।

रह अदृश्य हरदम पिता, सदा जिताता जंग।।13

 

बच्चों को शिक्षा दिला, दिखलाता वह  राह।

बच्चे बस उन्नति करें, मन में रखता चाह।।14

 

ऋण न चुका पाये कभी, हो कोई संतान।

वृद्धावस्था में मिले, बस थोड़ा सा मान।।15

– कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश

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