कर्ज जहर सम जान लें, जीना करें हराम।
रूखा सूखा पान कर, जीवन में आराम।।
जो मानव ऋण में फँसा, सदा रहें हैरान।
सबके नजरों से गिरे, खो देता पहचान।।
पैंसा जो लेता सदा, गिरवी रख सम्मान।
हर दिन खोटी बात से, हो जाता बेजान।।
सहज सरल करजा नहीं, लोग करें व्यापार।
घाटा लाभ सिधांत पर, चलता कारोबार।।
खर्चा पर अंकुश रखें, लेना नहीं उधार।
नगदा नगदी काम कर, जीवन बेड़ा पार।।
– अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
