दोनों पाँव अपने – सुनीता मिश्रा

 

दोनों पाँव ही अपने है

लेकिन अलग-अलग से सपने है

सपने सुहाने लड़कपन के..

खो गए जाने वें कहाँ,

एक पांव है विद्यालय से

महाविद्यालय तक का सफर,

तो दूजा पांव हमसफर के साथ

दुनियादारी तक का सफर,

हूँ देख मै अचंभित

दोनों पांव में है कितना अंतर ,

वह जो एक सपना था

विवाह के बाद वह हुआ छू मंतर,

उनदिनों हो बेपरवाह,

कितना मदमस्त थी इतर-उतर

अब वही करने लगे है कितने परवाह,

जो सोचते नहीं थे कुछ भी,

कितना सोचने लगे है वो!!

अपने ही सपनों को खोने लगे है वो,

देखो ना!

दोनों पाँव ही अपने है,

लेकिन अलग-अलग से सपने है!!

है आपसे एक ही गुजारिश,

दोनों सपनों को मिल जाने दो,

उन्मुक्त गगन में उड़ जाने दो,

भरे पुरे घर को

हसीं ठिठोली से खिल जाने दो!!

सुनीता मिश्रा, जमशेदपुर

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