दुर्लभ है मानुष जीवन
मिले न बारंबार !
तरूवर से टूट पत्ता गिरे,
बहुर न लगता डार !!1!!
चौरासी लाख हैं योनियाँ
भटके जन्म मृत्यु द्वार !
करले सत्कर्म तू यहाँ,
आना पड़े न बारंबार !!2!!
मानव जीवन पाके सुंदर
करले श्रीदर्शन निराकार !
तोड़ दे कर्मकांड भ्रम बेड़ियाँ,
होजा भव सागर पार !!3!!
पाया दुर्लभ पवित्र शरीर
दिव्यता का अहसास कर !
छोड़ दे माया का चक्कर,
श्रीप्रभु नाम सुमिरन कर !!4!!
सौभाग्य जगाए चल यहाँ पर
मिले न अवसर बारंबार !
भगा अंदर का जानवर,
जगा देवत्व, करले उद्धार !!5!!
– सुनील गुप्ता (सुनीलानंद), जयपुर, राजस्थान
