कुंभज ऋषि ने कथा सुनाई।
बहु विधि कीन्हे राम बढ़ाई।।
हर्ष गहे हैं सुन त्रिपुरारी।
चकित हुईं हैं दक्ष कुमारी।।
भ्रमण करें जो वन में रोते।
प्रिया हेतु निज धीरज खोते।।
क्रोधित होकर रावण मारे।
शिव उनको क्यों प्रभु स्वीकारे।।
सती कहीं तब शंका अपनी।
मनुज हेतु है माया ठगनी ।।
राघव उसमें कैसे उलझे।
नाथ नहीं मम शंका सुलझे।।
हँसे और बोले शिव शंकर।
परख सको तो पाओ उत्तर।।
समाधान जिस विधि से पाएं
युक्ति ढूँढ कर वह ले आयें।
रहे जहांँ लक्ष्मण रघुनाथा।
सती गईं सिय छवि के साथा।।
बहुत अचंभित दोनों भाई।
पूछन लगे शम्भु कुशलाई।।
मर्म राम उनका पहचाने।
लीला बहु विधि लगे दिखाने।।
राम सिया छवि लक्ष्मण साथा।
चहुँ दिश देख गहीं माँ माथा।।
नयना मूँदीं हैं घबरा कर।
दुखदाई था जीना पलभर।।
सँभलीं तब नजरें दौड़ाईं।
दूर – दूर तक निर्जन पाईं ।।
रामचंद्र महिमा जब जानी।
दुखित हुईं अति माता रानी।।
सोच सोच करनी पछतानीं।
आईं गिरि पर लौट शिवानीं।।
तब शिव पूछे कहो भवानी।
कैसे महिमा रघुवर जानी।।
कहीं नहीं कुछ बात छुपाई।
मन बदली मैं वापस आई ।।
सत्य नहीं पर शंकर माने।
ध्यान लगा कर घटना जाने।।
क्षोभ हुआ तब मन में भारी ।
शिव न सती वनिता स्वीकारी।
बात नहीं जाहिर शिव कीन्हे ।
शम्भु प्रतिज्ञा जप तप लीन्हे ।।
सती अकेलीं घर में रहतीं ।
शिव त्यागे यह सोचा करतीं।।
दक्ष यज्ञ की करुण कहानी।
बनी नीव यह कहते ज्ञानी।।
बात यहीं तक आज करेंगे।
योग बना यदि और लिखेंगे।।
— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश
