तू मेरे लिए –  सविता सिंह

लेखनी ही है एक ऐसी विधा,

जहाँ बाँच सकते उर की व्यथाI

भावनाओं को शब्दों में पिरो कर,

उकेर देते हैं उसे कागज परI

खोल देते हैं सारी गाँठे,

जो साक्षात नहीं जाते बाँटेI

हो न जाए कहीं कोई विवाद,

कलम से ही होता संवादI

भूत का कैसे हो वर्तमान में जिक्र,

भविष्य का ही होता हर पल फिक्रI

अधर को रखते अपने सिल के,

लेखनी धो देती गुबार दिल केI

एक तू ही तो है सच्ची सहेली,

वेदनाएँ सारे तुमने जो ले लीI

तुझ बिन आता सुकून न चैन,

तुझ संग बीते अब दिन रैनI

– सविता  सिंह मीरा , जमशेदपुर

 

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