लिख ली जब हमने पूर्ण किताब
उसमें जिससे करती संवाद,
उसको जब हमने पढ़ डाला
हाय! हमने तुझको गढ़ डाला।
शब्द शब्द हर आख़र आख़र
कहता हर मुखड़ा औऱ अंतरा
क्या हुआ, कैसे हुआ, क्या पता
कोई औऱ नहीं बस वो तुम थे।
तुझको ही पन्ने पर मढ़ डाला
हाय! हमने तुझको गढ़ डाला।
तुमको ही अंकित करती गई
तुम्हें संचित कर सिंचती गई
और यूँ ऐसा निष्कर्ष निकला
पता चला शीर्षक ही तुम हो।
कैनवास पर तुमको कढ़ डाला
हाय! हमने तुझको गढ़ डाला।
समीक्षा पुस्तक की हुई जब
प्रिये तुम ही परिभाषित हुये तब
तूलिका का ही ये दोष रहा
क्या कहें कहाँ तब होश रहा
पर वो ही सबसे है प्रिय कृति
है वो ही मेरी अनुपम निधि।
हृदय में अपने जकड़ डाला।
हाय बस तुझे ही मढ़ डाला।
– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर
