डा. अमित कुमार के काव्य संग्रह ‘मैं मौन हूँ’ में प्रेम, करुणा और आत्मबोध का समावेश – सुधीर श्रीवास्तव

vivratidarpan.com युवा कवि एवं साहित्यकार एवं नव साहित्य परिवार भारत के संस्थापक/नव साहित्य ई पत्रिका के संपादक डॉ. अमित कुमार बिजनौरी के प्रथम काव्य संग्रह ‘मौन हूँ मैं’ के प्रकाशित होते ही साहित्यिक जगत में हर्ष और उत्साह का वातावरण बन गया है।
‘मैं मौन हूँ’ काव्य संग्रह के प्रकाशन पर उन्हें देश-विदेश के साहित्यप्रेमियों, बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों और कवियों-लेखकों ने इस उपलब्धि को ग्रामीण प्रतिभा की सशक्त अभिव्यक्ति पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए बधाइयाँ और शुभकामनाएँ दी हैं। जिनमें प्रमुख हैं – यमराज मित्र सुधीर श्रीवास्तव (गोण्डा), डा. शिवनाथ सिंह शिव (रायबरेली), आचार्य धर्मेन्द्र (राष्ट्रीय अध्यक्ष -आचार्यकुल), संगीता चौबे पंखुड़ी (कुवैत), अमृत विसारिया (दुबई), डा. रामकरण साहू ‘सजल’ (बांदा), सुभाष चौरसिया (महोबा), डा. राजीव रंजन मिश्र एवं ममता प्रीति श्रीवास्तव (गोरखपुर), अरविंद कुमार अनोखे, अवधेश कुमार श्रीवास्तव एवं डा. ओम प्रकाश मिश्र ‘मधुब्रत’ (उन्नाव), नरेश चंद्र द्विवेदी (फिरोजाबाद), अनिल राही (ग्वालियर), वीणा सिन्हा (न्यू जर्सी), निधी बोथरा जैन (इस्लामपुर,प. ब.), सौदागर सिंह (देवरिया), डा. आर. के. तिवारी ‘मतंग’ एवं मनोरमा मिश्रा ‘मनु’ (अयोध्या), डा. रत्नेश्वर सिंह, डा. अणिमा श्रीवास्तव (पटना), जितेन्द्र कौशिक, राखी उपासना कौशिक (बिजनौर) आदि प्रमुख हैं।
मूलत: ग्रामीण परिवेश में रचे-बसे डा. बिजनौरी की रचनाओं में गाँव की मिट्टी की सोंधी खुशबू, आम जनजीवन की पीड़ा, संघर्ष, संवेदना और मानवीय मूल्यों की गहरी झलक देखने को मिलती है। ‘मौन हूँ मैं’ केवल कविताओं का संग्रह भर नहीं है, बल्कि समय, समाज और मनुष्य के भीतर चल रहे द्वंद्व का सजीव दस्तावेज है। इसमें मौन को प्रतीक बनाकर कवि ने सामाजिक विसंगतियों, आत्मसंघर्ष, प्रेम, करुणा और आत्मबोध जैसे विषयों को अत्यंत सधे हुए शब्दों में प्रस्तुत किया है। काव्य संग्रह में संकलित कविताएँ सरल भाषा में होते हुए भी गहन अर्थ लिए हुए हैं। पाठक इनमें अपने जीवन के अनुभवों की प्रतिध्वनि महसूस कर सकता है। आलोचकों का मानना है कि डॉ. अमित कुमार बिजनौरी की यह पुस्तक साहित्य जगत में मील का पत्थर साबित होगी।

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