झंकार – सविता सिंह

नीरव जीवन की स्मृतियों की राख तले

नयी आहट से स्पंदित साँसे

मौन को करती झंकृत।

बंद पड़ी वीणा के तार,

छूने से फिर झंकृत हुए,

मुरझाए उपवन के मन में,

कुछ सपने फिर अंकुरित हुए।

तुमने मन-मंदिर में आकर,

दीप जो प्रेम का जलाया,

तम से भरे हृदय में मेरे,

उजियारे फिर परिणत हुए।

– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *