सदा जगत व्यवहार में ज्ञान का रखिए मान।
भास्कर के उदय होत ही मिटे दीप अभिमान।।
ज्ञान जहाँ भी प्रकट हो मिट जाए सब क्लेश।
त्रिगुण सम्पदा बसे तह ज्यों भाषा में श्लेष।।
ज्ञान का करिये मान सब यह दुधारु तलवार।
अज्ञान परिच्छिन्न हो करे जबहिं यह वार।।
ज्ञान की प्रभुता है अमित, ज्ञान है तीर्थ समान।
ज्ञान खजाना के समक्ष सब कुछ धूल समान।।
कहूँ कहाँ लग ज्ञान की महिमा का गुणगान।
चक्षु ज्ञान के जब खुले होय परम् कल्याण।।
-नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश
