छूट रहा सब रिश्ता नाता, अब क्या सोंचे यार।
मन का पंछी चला अकेला, जाना है उस पार।।
सोन चिरैया तोले मोले,
बेचैनी में क्या क्या बोले,
बार बार लेती हिचकोले,
सांसों के सरगम पे डोल,
नादानी में समझ न पायें, अजब गजब व्यौहार।
मन का पंछी चला अकेला, जाना है उस पार।।
सुख-दुख के साथी सब छूटे,
ना जाने अपने क्यों रूठे,
बोल रहे सब तीते मीठे,
बाकी सारे निकले झूठे,
मन को अब कैसे बहलाये, रह रह उठता ज्वार।
मन का पंछी चला अकेला, जाना है उस पार।।
भोर शाम हर पल का रटना,
यह जीवन है मानो सपना,
घड़ी घड़ी बस रोना हँसना,
बात बात में हाय तरसना,
सुख-दुख की दो पवना बहती, चिंता का पतवार।
मन का पंछी चला अकेला, जाना है उस पार।।
तन-मन हार गया बेचारा,
बोलते सब करते किनारा,
देखते जग का यह पसारा,
आँखों-आँखों करे इशारा,
व्याकुल मनवा तोले मोले, इस जीवन का सार।
मन का पंछी चला अकेला, जाना है उस पार।।
-अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
