जाड़ों का मौसम और सुहानी धूप – सुनील गुप्ता

( 1 ) है जाड़ों का मौसम

निकली सुहानी धूप सुनहरी  !

चले समाए तन-मन में आनंद…,

खिलीं मधुर स्मृतियाँ मनोहारी !!

( 2 ) हैं शबनम की बूंदे

पड़ी शाखों पर चमकी !

मन अरमानों की चाहतें…,

खिलीं चहुँ ओर दमके महकीं  !!

( 3 ) बहे है ठंडी बयार

गुंजन भवरों की सुनते  !

चले मन में लहराती उमंगें…,

मृदु गीत गाते अधर थिरके !!

( 4 ) चले विहंग परवाज़ भरते

नीले आसमान में ऊँचे  !

धरा पे ठहरी ओस बूंदे…,

खिलाएँ इंद्रधनुष स्वप्निल सुनहरे !!

 

( 5 ) खिली धूप में बैठें

सपनों को रचते बुनते  !

आनंद के क्षणों में खोए…,

चलें हम हँसते मुस्कुराते !!

-सुनील गुप्ता, जयपुर, राजस्थान

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