तो जैसे रुक गया समय का बहाव
जैसे हर दिशा ने थाम ली साँसें
जैसे खुदा ने रख दी हों दो हथेलियाँ
मेरे काँपते कंधों पर।
जब तू गले लगा
तो शब्द बेमानी हो गए
और मौन ने कह डाली
सदियों की कहानियाँ।
तेरे सीने की गर्मी में
पिघलती रहीं सारी सर्द शामें
तेरी साँसों की छाया में
थम गईं जीवन की तमाम थकानें।
वो आलिंगन
कोई साधारण लम्हा न था
वो एक व्रत था
एक वचन था
एक गहरी प्रार्थना थी
जो दो हृदयों ने
एक साथ की थी
बिना बोले।
जब तू गले लगा
तो लगा जैसे
मैं लौट आयी हूँ
ख़ुद अपने भीतर…
एक घर, जो तेरे भीतर था।
©रुचि मित्तल, झझर, हरियाणा
