नहीं छोड़ पाया मैं,
अभी तक,
अपनी इस आदत को,
रात को जब,
सो रही होती है दुनिया,
मैं व्यस्त होता हूँ,
अपने काम में,
और डूबा रहता हूँ,
अपने विचारों में,
देखता रहता हूँ मैं,
सपनें आँखें खोलकर,
और छटपटाता रहता हूँ मैं।
खास, ऐसा होता,
खास, यह न होता,
बस, सोचता रहता हूँ मैं,
और फिर,
चुप हो जाता हूँ मैं थककर,
बढ़ा नहीं पाता मैं,
एक कदम भी आगे,
सिमटा हुआ हूँ मैं,
इसी परिधि में,
पिंजरे में बन्द,
एक पक्षी की तरह,
छटपटाता रहता हूँ मैं।
और कटती है,
इस तरह मेरी रातें,
गुजरता है इस तरह,
मेरा हर दिन,
कहता हूँ जब मैं,
किसी को अपना हाले-दिल,
हंसते हैं मुझ पर सभी,
मेरी मदद करने की बजाय,
लेकिन कहता नहीं कोई मुझसे,
कि मैं तुम्हारे साथ हूँ,
छटपटाता रहता हूँ मैं।
– गुरुदीन वर्मा आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां (राजस्थान)
