चित्रगुप्त कौन? एक दार्शनिक विश्लेषण – डॉ. जयप्रकाश तिवारी

vivratidarpan.com – भारतीय दर्शन में एक बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्धांत है “कर्मफल सिद्धांत”, यह सिद्धांत व्यक्ति को सदाचारी, कर्तव्यनिष्ठ और राष्ट्रवादी बनाता है। इसी कर्मफल सिद्धांत का मानवीकरण रूप और सरल व्याख्या है चित्रगुप्त अवधारणा। गूढ़ सिद्धांतों का मानवीकरण कोई नई बात नहीं है, भारतीय दर्शन में लगभग पूरा पौराणिक व्याख्यान, दार्शनिक सिद्धांत का मानवीकरण द्वारा सरल और सुगम अभिव्यक्ति है। उसी क्रम में “श्री चित्रगुप्त जी” की अवधारणा को समझना चाहिए। दर्शन और विज्ञान जगत दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि प्रत्येक क्रिया या कर्म का कोई न कोई फल (परिणाम) अवश्य होता है। जिसे दर्शन “कर्मफल सिद्धांत” कहता है उसे ही न्यूटन “गति का तिसारा नियम” कहता है (प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया उसी के बराबर होती है)। प्रश्न है इसका दृष्टा कौन है? विज्ञान दृष्टा के बारे में मौन है। वह इसको भौतिक क्रिया कहकर शांत और संतुष्ट हो जाता है। किंतु भारतीय दर्शन यहां शांत नहीं होता, वह एक दृष्टा की एक सुव्यवस्थित कल्पना करता ही। वेदांत दर्शन में यह “दृष्टा” अत्यंत महत्वपूर्ण है, यह वेदांत दर्शन का केंद्रीय विंदु है।

पौराणिक दर्शन ने इस गूढ़ “दृष्टा” को मानवीकृत करके अत्यंत सरल कर दिया है जिससे एक साधारण नागरिक भी कर्म और कर्मफल को समझकर निषिद्ध कर्म, असंवैधानिक कर्म, अनैतिक कर्मों से डरे। और संतोष की बात है कि आमजन पर इसका सार्थक प्रभाव देखने को मिलता है। इस प्रकार चित्रगुप्त जी को भारतीय दर्शन में कर्मफल सिद्धांत के सर्वोच्च नियंता, कर्मों के सत्य दृष्टा और यमराज (कर्मफल प्रदाता) के सहायक के रूप में (सूक्ष्म लेखाकार) कल्पित किया गया हैं। वे प्रत्येक जीव के अच्छे-बुरे कर्मों का अग्रसंधानी (सटीक लेखा जोखा) रखते हैं, जो मृत्यु के बाद न्याय का आधार बनता है (कुछ अन्य मतों में इसी व्यवस्था को “न्याय दिवस” कहा गया है, जहां एक दिवस विशेष को सामूहिक न्याय होगा)। यह कर्म-चेतना, निष्पक्ष न्याय, और ‘कर्म ही प्रधान है’ के दार्शनिक सिद्धांत को रेखांकित करता है। इस प्रकार पौराणिक चित्रगुप्त जी का वैज्ञानिक और दर्शन महत्व है।

#चित्रगुप्त जी इस दार्शनिक अवधारणा के सबल प्रतीक हैं कि कोई भी कर्म अदृश्य नहीं रहता। कोई भी व्यक्ति छे कितना भी सबल हो वह कर्मफल से बच नहीं सकता। आज भी जिसे न्यायालय से न्याय नहीं मिल पाता, वे केवल इस आधार पर संतोष के साथ जीवन जीते हैं कि भगवान उनके दुष्कर्मों की सजा अवश्य देगा। यह विश्वास इतना सबल और आशावादी है कि न्याय, अन्याय से मुक्त वह वह अपने जीवन यापन में जुट जाता है। यह सोचने की बात है कि यदि मना मन में यदि यह आशा और विश्वास न रहे कि भगवान उसे सजा देगा। यहां लौकिक जगत में जोड़ तोड़ के चलते यदि न्याय न मिला तो व्यक्ति क्या प्रतिक्रियावादी, उग्र नैतिक संहारक जैसा नहीं बन जाएगा। हमलोगों में किस्से, कहानियों और फिल्मों में दमित, शमित, शोषित को इसी न्याय के नाम पर हथियार उठाते, दस्यु या नक्सलवादी बनते देखा है। अन्याय के लिए ‘अग्रसंधानी’ नामक बहीखाते में मनुष्य के हर विचार, वाणी और कार्य को लिपिबद्ध किया गया है, चित्रगुप्त जी स्वयं लिपिबद्ध किया है तो न्याय तो मिलना ही है। यह विश्वास व्यक्ति को अनैतिक, गैरकानूनी काम करने से रोकता है। यह समाज शास्त्र, मानवशास्त्र, विधि व्यवस्था के लिए बहुत बड़ी राहत की बात है।

निष्पक्ष न्याय (Divine Justice):-  चित्रगुप्त जी द्वारा प्रस्तुत के कर्मों का विवरण न्यायधीश यमराज को कर्मफल देने में सुनिश्चित कारक बनता है। इस विवरण से ही यह सुनिश्चित होता है कि आत्मा को उसके द्वारा किए गए कर्मों (पाप/पुण्य) के आधार पर ही निर्धारित फल मिले।

उत्तरदायित्व (Accountability): – चित्रगुप्त की अवधारणा दार्शनिक रूप से यह संदेश देती है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्यों के लिए स्वयं ही उत्तरदाई है। यह चेतना मनुष्यों को नैतिक और सही आचरण करने के लिए प्रेरित करती है। ध्यातव्य ही की इसी उत्तरदायित्व और कर्मफल के सिद्धांत ने रत्नाकर डाकू और अंगुलिमाल जिसे अपराधियों का जीवन बदल दिया। इतनी शक्ति है इस सिद्धांत में और चित्रगुप्त जी की सत्यनिष्ठा में।

ज्ञान और विवेक के प्रतीक: – यह सिद्धांत ज्ञान और विवेक का भी प्रतिनिधित्व करता है। चित्रगुप्त जी को ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न माना जाता है और वे ज्ञान (कलम और स्याही) का प्रतीक हैं। यह दर्शाता है कि ज्ञान ही सही कर्म का मार्गदर्शक है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया (यम द्वितीया) पर्व इस दिन कलम, स्याही और बहीखातों की पूजा का दार्शनिक बिंब है। सच तो यह है कि व्यक्ति कर्मों की स्याही से स्वयं ही अपना कर्मफल लिख देता है। किंतु अज्ञान के अभाव में इसका बोध नहीं है। अपने कर्मों का आत्म-निरीक्षण करना, ज्ञान को सम्मान देना और कर्मों के लेखा-जोखा को शुद्ध रखना। अपने को उत्तरदाई मानकर कर्मफल के अधीन रखने के सिद्धांत सचमुच महानीय और नामनीय है। आज इसी कर्म और कर्मफल के दृष्टा, संचयक श्रीचित्रगुप्त जी महाराज की जन्म जयंती है। ऐसे सर्वदृष्टा को कोटिश: नमन और वंदन।

(चित्रगुप्त जयंती विशेष)

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