नहीं चाह महलों और अट्टालिकाओं की
न ही सजे हुए बेशकीमती झाड़फानूसों की
केवल सुकून तुम्हारी बलिष्ठ भुजाओं का
मुझे तो तुम्हारा साथ चाहिए था
जीवन की अंधेरी लंबी रातों में
जब मैं भय से कांप उठती थी
चाह थी कोई तो हो मेरे पास
जो यह बोले, मैं हूँ ना
चाह बस एक छोटा सा चौबारा
बैठ साथ जहां कर सकते थे
अपने सुख दुख साझा एक दूजे से
कुछ सुकून भरे पल बीता सकते
चीरता हैं यह अदृश्य अंतहीन सन्नाटा
अपनी सांसों की आवाज़ भी देती सुनाई
चाहती हूं, हो कलरव, कुछ अपनों का शोर
अपनों का स्पर्श, अपनो का साथ
नहीं चाह रही अब सफलताओं की
क्योंकि उसकी कीमत चुकानी पड़ती हैं
बहुत से अपनों का साथ छोड़ना पड़ता हैं
अंत में अकेलापन अपनाना पड़ता हैं
नहीं चाह रही सब कुछ पाने की
अब सब कुछ लौटा देना चाहती हूं
चाहे किसी से उधार ली हुए पुस्तक
या बेशकीमती यादों का पिटारा
भीगी भीगी से रातें या
सीले सीले से दिन
वो डायरी में रखा सूखा गुलाब
जिसकी महक अभी भी हैं बाकी
इन सबको दे वापिस, उन्हीं को
अब सुकून से जीना चाहती हूँ।
– रेखा मित्तल, चंडीगढ़
