चाय – अनिरुद्ध कुमार

 

चाय बिना सब कुछ है फींका।

इसनें सबका दिल है जीता।।

चाय बना जीवन जन-जन का।

औषधि लगता है तन-मन का।।

 

आशिक इसके बहुत दिलेरे।

चाय जहाँ प्याली को घेरे।।

चुस्की लेते मस्त हो जायें।

तरह तरह की बात सुनायें।।

 

जागे सोये चाय लुभाये।

चाय गरम बहुते मन भाये।।

चाय बिना मुस्किल है जीना।

चाहत बोलें जल्दी पीना।।

 

चाय बिना मनवा भरमाये।

इच्छा जागे जल्दी पायें।।

चाय जरा सा मुख में जाये।

धन्य-धन्य तन-मन हो जाये।।

– अनिरुद्ध कुमार सिंह

धनबाद, झारखंड

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