झटपट चल देता है सुबह-
शाम को घर आ जाता है,
रात के लंबे लम्हों में वह-
खुद से खुद बतियाता है.
मैं ‘धरती माँ’ममतामयी
उससे गहरा नाता है…
जग घूरे जाता है उसको-
वो ‘चाँद’ कहलाता है.
घने अँधेरे में रहकर भी-
कभी नहीं घबराता चंदा,
जगमग करते तारे उस पर-
डालें सदा मोह का फंदा.
मैं सबका,कोई न मेरा-
चुप रहकर कह जाता है,
रहता है वो हर एक दिल में-
अपनों को अपनाता है,
जग घूरे जाता है उसको-
वो चाँद कहलाता है.
गगन पिता सा संग रहे-
लहराता,बल खाता है,
गरजे,बरसे,तरसे अक्सर-
सह्रदय जीवन-दाता है.
जग घूरे जाता है उसको-
वो चाँद कहलाता है.
– डा. अंजु लता सिंह, गहलौत, नई दिल्ली
