हम पे क़ातिल निगाह जब उट्ठी,
रख दिया हमने ज़ेर-ए -ख़ंजर दिल।
तुमको हम पर तरस नहीं आता,
ऐ सनम कितने तुम हो पत्थर दिल।
” *मीरा* ” कैसे ना अब ग़ज़ल लिक्खे,
बन चुका मेरा भी सुख़नवर दिल।
हम पे क़ातिल निगाह जब उट्ठी,
रख दिया हमने ज़ेर-ए -ख़ंजर दिल।
तुमको हम पर तरस नहीं आता,
ऐ सनम कितने तुम हो पत्थर दिल।
” *मीरा* ” कैसे ना अब ग़ज़ल लिक्खे,
बन चुका मेरा भी सुख़नवर दिल।