बिरह बदन झकझोर सताये।
सजल नयन मन पीर जताये।।
तपन लहर तकदीर बुझाये।
सजन अवन कहके भरमाये।।
उमड़-घुमड़ बदरा मडराये।
गरज-गरज मनमीत बुलाये।।
चमक-दमक चितके अकुलाये।
डकर-डकर नित शोर मचाये।।
लचक-लचक बनफूल रिझाये।
फुदक-फुदक खग नेह जताये।।
उदित-मुदित नव राह दिखाये।
सरपट तन मन दौड़ लगाये।।
लहर-फहर चुनरी लहराये।
इधर-उधर पगली बलखाये।।
लचक-लचक उपहार लुटाये।
मटक-मटक पहुना घर आये।।
रिमझिम-रिमझिम बादर कारे।
सजधज कर धरती किलकारे।।
विहस विहस वर पाँव पखारे।
सब कुछ तज हर रंग उभारे।।
सरस पवन सुरताल मिलाये।
तन-मन नव उरजा भरजाये।।
पुलकित कण-कण धूम मचाये।
सहज सरल घर सावन आये।।
– अनिरुद्ध कुमार सिंह
धनबाद, झारखंड
