घनाक्षरी – कविता बिष्ट

 

अंग धारि धनु बाण,दिव्य ज्योति शक्ति प्राण,

लखन  सह श्रीराम ,जनक  दुलारी है।

 

भाल पड़ी जय माल,गाल हैं गुलाबी लाल,

दशरथ  सुपुत्र  हुआ, राम  धनुर्धारी  है।

 

अवनी का हरे भार,ख्याति हुई भिनसार,

रघुकुल  का दीप ही, हुआ अवतारी है

 

हर्षित हैं  महतारी, लाज हुई सुकुमारी,

आभा मुख मंडल की नेह सुखकारी है।

–  कविता बिष्ट ‘नेह, देहरादून, उत्तराखंड

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