गया था मैं मेडिकल वार्ड में
जहां रोग विविध रोगी अनेक
रोग भले हों, भांति भांति के
मांग है ‘रक्त की बोतल’ एक
देखा था टपकते बोतल से
रक्त की लाल लाल बूंदों को
दे रही थी जो एक नवजीवन
बेजान पड़े किसी मानव को
नहीं जानता हममे से कोई
थी लाल बूंदें यह किसकी?
किसी किशोर या प्रौढ़ की,
हिन्दू, सिक्ख या बौद्ध की?
किसी पुरुष की या नारी की
योगी-भोगी, संत गृहस्थ की
अथवा किसी ब्रह्मचारी की
अधिकारी या कर्मचारी की?
दे सकता है ‘रक्त’ हमारा
दम तोड़ते को पुनर्जीवन
ले सकता है- ‘दंभ’ हमारा
हँसता खेलता कोई जीवन
अहं में घुलकर यही प्रवृत्ति
कुछ उबल-उबल जाता है
यह उबला रक्त समाज को
यूँ ही..फिर निगल जाता है
रक्त – रक्त में भेद है भाई
इस अन्तर को जानो भाई
एक रक्त है – ‘जीवनदाता’
दूजा समाज कोढ़ कहाता
नेत्रदान भी एक महादान है
जनता अब भी अनजान है
आओ हम ऐसा कर जाएँ
नेत्रदान करके राह दिखाए
‘गोदान’ का फल देखा नहीं
क्यों उलझें गोदान के पीछे?
गोदान में एक छिपा स्वार्थ है
रक्तदान-नेत्रदान पुरुषार्थ है।
– डॉ. जयप्रकाश तिवारी
बलिया, उत्तर प्रदेश
