माँ का प्यार दुलार जगत में , निर्मलता बरसाता है।
त्याग, क्षमा के पुष्पों द्वारा, अवचेतन महकाता है।
रिश्तों का संसार हमारी , करनी का प्रतिफल देता।
सहयोगी आचरण न हो तो, कौन आपकी सुधि लेता।
किन्तु हृदय माँ का निर्मोही, कभी नहीं हो पाता है….।
संतति की सुख सुविधा को माँ, सबसे ऊपर रखती है।
सावधान दुनियांँ के छल से, उसको करती रहती है।
सदा शुभेच्छाओं के मोती, माँ का प्यार लुटाता है……।
माता के आँचल की छाया , जैसा रत्न नहीं जग में।
कंटक चुनकर सुमन बिछाती , मात सदा जीवन मग में।
शिक्षा माँ की गहने वाला, सुख सम्मान कमाता है….।
— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश
