गीत – मधु शुक्ला

 

हमें धर्म अपना भुलाना नहीं है।

दुखी दीन से दृग चुराना नहीं है।

 

कृपा ईश से जन्म मानव मिला है।

सृजन हेतु यह पुष्प तन का खिला है।

इसे भोग का पथ दिखाना नहीं है…..।

 

सदा भाव करुणा,क्षमा,त्याग,ममता।

बढ़ाते  जगत  में  रहे  भाव  समता।

इन्हें भूलकर भी गँवाना नहीं है….।

 

मनुज सभ्यता माँगती आज पोषण।

गहें प्रीति को हम तजें दीन शोषण।

हमें वंश अपना मिटाना नहीं है….।

— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश

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