गीत – जसवीर सिंह हलधर

अर्थ क़ायम नहीं हो सके शब्द के, सामने पंक्तियों के खड़े हाशिए ।

गीत पूरा नहीं हो सका रात भर , जागता ही रहा पृष्ठ काले किए ।।

 

तथ्य का सत्य से जब हुआ सामना,चांद मध्यम हुआ चांदनी ढल गई ।

लग गई वक्त की बददुआ क्यों मुझे ,साधना काम की आग में जल गई ।

देखकर सामने चांदनी का चलन, आँख से हुस्न के जाम जी भर पीए ।।

गीत पूरा नहीं हो सका रात भर ,जागता ही रहा पृष्ठ काले किए ।।1

 

आँख से अश्क इतने बहे क्या कहूं ,दर्द ही दर्द था  यार की याद में ।

पागलों की तरह मैं तड़पता रहा ,आज भी जी रहा घोर अवसाद में ।

लोग समझे कि शायर शराबी हुआ ,उस ग़ज़ल से मिलाने लगा काफ़िए ।।

गीत पूरा नहीं हो सका, रात भर, जागता ही रहा पृष्ठ काले किए ।।2

 

गांव में जन्म मेरा हुआ है मगर, भीड़ में आ फंसा मैं कहां से कहां ।

ज़िन्दगी ये पहेली बनी है मेरी ,गीत ग़ज़लें बनी हैं मेरा आशियां ।

कोई कविता कहेगा इन्हें बाद में, कोई बतलाएगा शोक के मर्सिए ।।

गीत पूरा नहीं हो सका रात भर, जागता ही रहा पृष्ठ काले किए ।।3

 

लोग करते रहे संधियां वक्त से , मैं अड़ा वक्त कि चाल को थामने ।

ज़िन्दगी पीठ पर लाद कर मैं खड़ा,प्राण के त्राण से मौत के सामने ।

यक्ष का प्रश्न ‘हलधर’ बता कौन है , लेखनी में छुपा  दर्द किस के लिए ।।

गीत पूरा नहीं हो सका रात भर,जागता ही रहा पृष्ठ काले किए ।।4

– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

 

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