गीत – जसवीर सिंह हलधर

तुम चाहे मानो मत मानो , पर मेरा विश्वास अटल है ।
मज़हब अगर नहीं होते तो ,रूप जगत का न्यारा होता ।।

जाति धर्म के बंध न होते , आपस में संबंधी होते ।
बंधन संसाधन बन जाते ,विपदा में अनुबंधी होते ।।
क्रिश्चिन,मुस्लिम,बुद्ध न होते , आपस में फिर युद्ध न होते ,
यक्ष प्रश्न यदि ऋषि मुनियों ने, संयम पूर्ण विचारा होता ।।
मज़हब अगर नहीं होते तो , रूप जगत का न्यारा होता ।।1

सरहद मुक्त विश्व होता यह , भौगोलिक सीमांकन होता ।
भूमि तापमान बढ़ने पर ,सकल विश्व में मंथन होता ।।
भांति परिंदों के मानव भी , दुनिया भर में विचरण करता ,
राग द्वेष सारे मिट जाते , मानव धर्म हमारा होता ।।
मज़हब अगर नहीं होते तो, रूप जगत का न्यारा होता ।।2

प्राकृतिक विपदा की खातिर ,सेना काम काज सब करती ।
परमाणु से बिजली बनती,उजियारी हो जाती धरती ।।
अस्त्र शस्त्र की होड़ न होती ,कितने धन साधन बच जाते ,
भूख गरीबी से लड़ने में , यह धन एक सहारा होता ।।
मज़हब अगर नहीं होते तो , रूप जगत का न्यारा होता ।।3

सागर में भी कोलाहल है ,रोज मिसाइल बम चलने से ।
अब भी समय सँभल जा “हलधर”,दुनिया बच जाये जलने से ।।
रंग भेद विस्तारवाद का, नाग समय पर कुचला होता ,
स्वर्ग सरीखी धरती होती , रंग निराला प्यारा होता ।।
मज़हब अगर नहीं होते तो , रूप जगत का न्यारा होता ।।4
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

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