युग युग से वरदान रही जो ,खेती बाड़ी उसे डराये ।
अर्थी लेटा पूत धरा का ,बोलो उसको कौन बचाये !!
स्वागत करते घने अँधेरे ,छूट गयी पीछे रोशनियाँ !
कर्जे से पसरा सन्नाटा ,रोज डराता ब्याजू बनियाँ !
आँखों के आगे छाये हैं ,आँधी बरसातों के साये !।
अर्थी लेता पूत धरा का ,बोलो उसको कौन बचाये !!1
गुर्राते रोजाना उस पर ,जन्तु सींग नाखूनों वाले !
हाथों की रेखा को खायें ,काले काले खूनी छाले !
घूम रही जंगली आंधियाँ ,कैसे उनसे फसल रखाये !।
अर्थी लेटा पूत धरा का ,बोलो उसको कौन बचाये !!2
तीखी काँटेदार हवायें ,उसकी किस्मत से उलझी हैं !
चट्टानों से टकरा कर भी ,जीवन लीला कब सुलझी है !
सरकारी फाइल में अटके ,उसकी खटिया के चौपाये ।।
अर्थी लेटा पूत धरा का ,बोलो उसको कौन बचाये !!3
रेतीले टीले में गुम है ,उसके जीवन की रस धारा !
हीन दशा में लेटा है अब ,टूटा फूटा ये ध्रुव तारा !
नंगा बदन ठिठुरता बचपन ,सर्दी उसका पशुधन खाये ।।
अर्थी लेटा पूत धरा का ,बोलो उसको कौन बचाये !!4
धरती ऐसा कंचन मृग है ,खोजन इसको जो भी आया !
राम सरीखे देवों ने भी ,मरते दम तक दुख ही पाया !
कितने “हलधर ” डूब मरे हैं ,कितने अब तक आग जलाये !
अर्थी लेटा पूत धरा का ,बोलो उसको कौन बचाये !!5
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून
